बस्तर की फिजा में बदलाव का नया अध्याय: जहां कभी गूंजती थीं गोलियां, वहां कलाई पर सजा ‘भरोसे का धागा’

रायपुर 30 अगस्त : ऐतिहासिक और भौगोलिक रूप से खौफ और संघर्ष की दास्तां बयां करने वाले बस्तर अंचल ने इस बार रक्षाबंधन के पर्व पर एक ऐसी लकीर खींची है, जो आने वाले कल के भारत की सबसे खूबसूरत तसवीर बन गई है। कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर स्थित सुरक्षा बल कैंप में जो हुआ, उसने यह साबित कर दिया कि इंसानियत के धागे में वह ताकत है जो बंदूक की नली को भी झुका सकती है और दशकों के अविश्वास को एक पल में पिघला सकती है।
यह महज एक खबर नहीं, बल्कि उस वैचारिक और मानवीय क्रांति का दस्तावेज है, जहां कभी एक-दूसरे के खून के प्यासे रहे लोग आज भाई-बहन के पवित्र रिश्ते में बंधे नजर आए।
जब थम गया वक्त: वर्दी और पूर्व नक्सलियों का मिलन
भानुप्रतापपुर कैंप का वह दृश्य किसी फिल्मी क्लाइमैक्स से कम नहीं था। एक तरफ वे सुरक्षा बल के जवान थे, जिनकी छाती पर देश की सुरक्षा का तमगा और हाथों में हथियार थे; तो दूसरी तरफ वे महिलाएं थीं, जिन्होंने अपनी जिंदगी के 25 बहुमूल्य साल नक्सली संगठनों के अंधेरे जंगलों और बारूदी सुरंगों के बीच गुज़ारे थे।
जब इन महिलाओं—जिनमें मुख्य रूप से मीना का नाम शामिल है—ने आगे बढ़कर जवानों की कलाइयों पर राखी बांधी, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं। यह दृश्य इस बात का गवाह था कि यदि नीयत साफ हो और मुख्यधारा में लौटने वालों को समाज का संबल मिले, तो सबसे बड़ी दूरियां भी मीलों से घटकर दो गज की दूरी में बदल जाती हैं। जवानों ने भी अपनी इन नई बहनों के माथे पर तिलक लगाया, उपहार दिए और पूरी आत्मीयता के साथ उनकी सुरक्षा और सम्मान का वचन निभाया। इस भावुक लम्हे में महिला पुलिसकर्मियों की सहभागिता ने यह और स्पष्ट कर दिया कि अब खाकी और आम जनमानस के बीच की खाई तेजी से पट रही है।
“यह सिर्फ त्योहार नहीं, शांति की बहाली का सबसे बड़ा माध्यम है”
कांकेर के पुलिस अधीक्षक श्री निखिल राखेचा ने इस अनूठी पहल के दूरगामी परिणामों पर प्रकाश डालते हुए इसे नक्सलवाद के खात्मे की दिशा में सबसे मानवीय और ठोस कदम बताया है।
“यह सिर्फ राखी बांधने का एक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह बस्तर में खोए हुए विश्वास को वापस पाने का महाअभियान है। जब पूर्व नक्सली और सुरक्षा बल के जवान एक मंच पर भाई-बहन के रूप में खड़े होते हैं, तो यह समाज को एक कड़ा संदेश देता है कि हिंसा का रास्ता गलत था और मुख्यधारा की बांहें हमेशा स्वागत के लिए खुली हैं।” — श्री निखिल राखेचा, एसपी, कांकेर
ढाई दशक का अंधेरा और राखी का एक धागा: मीना की जुबानी
25 साल तक बंदूक की छांव में जीने वाली मीना के लिए यह पल पुनर्जन्म जैसा था। जंगलों के क्रूर नियम, साथियों का खोना और हर पल मौत के साए में जीने के बाद जब वह मुख्यधारा में लौटीं, तो उनके मन में समाज को लेकर कई आशंकाएं थीं।
लेकिन भानुप्रतापपुर कैंप में जब उन्होंने एक सुरक्षाकर्मी की कलाई पर रक्षासूत्र बांधा, तो उनके भीतर का सारा डर और अतीत का कड़वापन बह गया। मीना जैसी अन्य महिलाओं के लिए यह राखी इस बात की घोषणा थी कि वे अब हिंसा के इतिहास को दफना चुकी हैं और एक सम्मानित, शांतिपूर्ण जीवन की शुरुआत कर चुकी हैं।
बस्तर की बदली तकदीर: गोलियों की गूंज से विकास की थिरकन तक
कभी बस्तर का नाम आते ही मन में सिर्फ लैंडमाइन ब्लास्ट, शहीद जवानों की अर्थियां और माओवादी आतंक का चित्र उभरता था। लेकिन आज छत्तीसगढ़ की तसवीर तेजी से बदल रही है:
- विकास का उजला सवेरा: सड़कविहीन गांवों में डामर की पक्की सड़कें पहुंच रही हैं, बच्चों के लिए स्कूल और आधुनिक अस्पताल खुल रहे हैं।
- आत्मसमर्पण की बयार: ‘नक्सल मुक्त बस्तर’ के संकल्प के साथ राज्य में बड़ी संख्या में माओवादी हिंसा का दामन छोड़कर समाज की मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं।
- मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति: प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के मजबूत मार्गदर्शन और मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के दूरदर्शी नेतृत्व में चल रहे समन्वित अभियानों ने नक्सलियों की कमर तोड़ दी है।
निष्कर्ष: बस्तर अब विश्वास के रास्ते पर है
छत्तीसगढ़ सरकार का यह स्पष्ट विजन है कि बस्तर में स्थायी शांति केवल सुरक्षा बलों की बंदूकों से नहीं आ सकती, बल्कि वहां के लोगों के दिलों में सरकार और समाज के प्रति भरोसा जगाना उतना ही जरूरी है।
भानुप्रतापपुर का यह रक्षाबंधन इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि यदि आप इंसान को गले लगाते हैं, तो वह भी बंदूक छोड़कर गले मिलने को तैयार है। आज बस्तर में रिश्तों के बीच से बंदूक की दीवार हट चुकी है और उसकी जगह विश्वास, भाईचारे और प्रगति का नया धागा बंध चुका है—जो एक स्वर्णिम और शांत बस्तर के उदय का शंखनाद कर रहा है।
बस्तर संवाद डेस्क विशेष रिपोर्ट
