दंतेवाड़ा में ‘बिहान’ का कमाल: संघर्ष से स्वावलंबन तक की राह तय कर रही हैं ग्रामीण महिलाएं, मुर्गी पालन से रामबती ने लिखी सफलता की नई कहानी

रायपुर 8 सितम्बर : माओवादी हिंसा और पिछड़ेपन के दाग धोने के बाद अब छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा जिला विकास, उम्मीद और महिला सशक्तिकरण की नई गाथा लिख रहा है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (‘बिहान’) के तहत संचालित इंटीग्रेटेड फार्मिंग क्लस्टर योजना ग्रामीण अंचल की महिलाओं के लिए किसी वरदान से कम साबित नहीं हो रही है। दंतेवाड़ा और कुआकोंडा विकासखंडों में पिछले डेढ़ साल से चल रही इस योजना ने लगभग 2,200 परिवारों के जीवन में आर्थिक समृद्धि के नए द्वार खोले हैं। यह पहल अब सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनती जा रही है।
कठिनाइयों को मात देकर मिसाल बनीं रामबती नाग
दंतेवाड़ा जिले के सुदूर कुआकोंडा विकासखंड स्थित ग्राम मुड़ापारा की निवासी रामबती नाग की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है, जहां संघर्ष के बाद सफलता का सूरज उगता है।
- योजना का संबल: जिला प्रशासन और ‘बिहान’ की टीम के सहयोग से रामबती को जून माह में विशेष रियायत पर 100 चूजे (₹80 प्रति चूजा की दर से) और उनके पालन के लिए उच्च गुणवत्ता वाला दाना उपलब्ध कराया गया।
- शुरुआती झटके और दृढ़ संकल्प: हर नए कारोबार की तरह शुरुआत में मुश्किलें आईं। संक्रमण और बीमारी के कारण 25 से 30 चूजों की असमय मौत हो गई। इस झटके से रामबती घबराई नहीं, बल्कि उन्होंने दोगुने जोश और वैज्ञानिक तरीकों से बाकी बचे चूजों की दिन-रात तीमारदारी की।
- शानदार मुनाफा: उनकी यह मेहनत आखिरकार रंग लाई। आज रामबती अपने स्वस्थ मुर्गों को ₹500 प्रति किलोग्राम की शानदार दर से खुले बाजार में बेच रही हैं, जिनका औसत वजन 1 से 3 किलोग्राम तक है। इस प्रकार वे अब तक ₹25,000 की शुद्ध कमाई कर चुकी हैं, जिससे उनके घर की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत हुई है।
‘ब्रुडिंग सेंटर मॉडल’: महिला उद्यमियों के लिए डबल प्रॉफिट का फॉर्मूला
इस पूरी योजना का सबसे आधुनिक और प्रभावी पहलू इसका क्लस्टर और ब्रुडिंग सेंटर मॉडल है, जो महिलाओं को दोहरे मुनाफे का अवसर दे रहा है:
- क्रॉस असील प्रजाति का विशेष चयन: क्लस्टर स्तर पर चुनी गई महिला उद्यमी बाहर से बेहतरीन गुणवत्ता वाले ‘ज़ीरो-डे’ (एक दिन के) क्रॉस असील प्रजाति के चूजे मंगवाती हैं।
- 15 दिन की क्रिटिकल केयर: इन चूजों को ब्रुडिंग केंद्रों में विशेष देखरेख और वैज्ञानिक तरीके से 15 दिनों तक पाला जाता है, ताकि उनकी सर्वाइवल रेट (जीवित रहने की क्षमता) बढ़ जाए।
- दोतरफा रोजगार सृजन: इसके बाद इन स्वस्थ चूजों को समूह की अन्य महिलाओं को सौंपा जाता है। इस बेहतरीन चेन सिस्टम से एक तरफ चूजे तैयार करने वाली महिला उद्यमी कमाई करती है, तो दूसरी तरफ पालन करने वाली महिला को भी सीधा मुनाफा मिलता है।
450 से अधिक महिलाओं के जीवन में आया आर्थिक बदलाव
जिले के विभिन्न क्लस्टरों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। अब तक 450 से अधिक ग्रामीण महिलाओं को इस आजीविका गतिविधि से जोड़कर मुख्यधारा में लाया जा चुका है। महिलाओं की कार्यकुशलता और उनकी आर्थिक जरूरत को देखते हुए उन्हें एक बार में 50 से 100 चूजे मुहैया कराए जाते हैं।
‘बिहान’ योजना ने ग्रामीण महिलाओं को केवल आर्थिक रूप से संबल ही नहीं दिया है, बल्कि उनके भीतर यह अटूट आत्मविश्वास भी पैदा किया है कि वे अपने परिवार और समाज की तकदीर खुद बदलने का माद्दा रखती हैं। रामबती जैसी महिलाएं आज पूरे बस्तर संभाग के लिए एक जीता-जागता प्रेरणास्रोत बन चुकी हैं।
