72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में छत्तीसगढ़ का डंका: रामनामी समुदाय पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘राम-नामी’ को मिला सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र का राष्ट्रीय पुरस्कार
रायपुर 22 सितम्बर । छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, अटूट आस्था और ऐतिहासिक विरासत ने राष्ट्रीय पटल पर एक बार फिर इतिहास रच दिया है। 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में नई दिल्ली में माननीय राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु के कर-कमलों से छत्तीसगढ़ के अनूठे रामनामी समुदाय के जीवन पर आधारित डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘राम-नामी’ को सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र (Best Documentary) के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह ऐतिहासिक क्षण समूचे छत्तीसगढ़ के लिए अत्यंत गौरव और हर्ष का विषय है।

इस गौरवपूर्ण उपलब्धि पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने फिल्म के निर्देशक श्री भरतबाला गणपति और उनकी पूरी टीम को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दी हैं। मुख्यमंत्री ने इसे राज्य की सांस्कृतिक विरासत की बहुत बड़ी जीत बताया है।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय का संदेश: “रामनाम ही जिनका धर्म, रामभक्ति ही जिनका कर्म”
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने इस उपलब्धि को छत्तीसगढ़ की लोक आस्था के लिए एक मील का पत्थर बताते हुए कहा, “रामनाम ही जिनका धर्म है, रामभक्ति ही जिनका कर्म, ऐसे पवित्र रामनामी समुदाय के लोगों के तन पर अंकित ‘राम’ केवल अक्षर नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही अटूट आस्था, साधना और समर्पण की पहचान हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि राम के नाम समर्पित इस समुदाय पर आधारित डाक्यूमेंट्री ‘राम-नामी’ ने इस अनूठी सांस्कृतिक विरासत को देश-दुनिया तक पहुँचाकर छत्तीसगढ़ की लोक आस्था और संस्कृति को राष्ट्रीय मंच पर नई पहचान दी है। यह सम्मान हमारी समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए भी बेहद प्रेरणादायी साबित होगा।
क्या है ‘रामनामी’ समुदाय की अनूठी विरासत?
छत्तीसगढ़ का रामनामी समुदाय अपनी अनूठी और कठिन रामभक्ति के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। इस समुदाय के लोग:
- नख-शिख रामनाम: अपने पूरे शरीर पर स्थायी रूप से ‘राम’ नाम का गोदना (टैटू) गुदवाते हैं।
- रामरमी वस्त्र: ‘राम-राम’ लिखे विशेष वस्त्र धारण करते हैं।
- मोरपंख का मुकुट: सिर पर मोरपंख से बना मुकुट पहनते हैं।
- निराकार भक्ति: इनका मानना है कि राम किसी एक मंदिर में नहीं बल्कि कण-कण में व्याप्त हैं। सदियों से चली आ रही यह परंपरा सामाजिक समरसता और शुद्ध भक्ति का एक जीवंत उदाहरण है।
निर्देशक भरतबाला गणपति के निर्देशन में निखरा छत्तीसगढ़ का गौरव
मशहूर फिल्म निर्माता और निर्देशक श्री भरतबाला गणपति के कुशल निर्देशन में बनी इस डॉक्यूमेंट्री ने रामनामी समुदाय के आंतरिक आध्यात्मिक संसार, उनके संघर्ष, उनके भजनों और उनकी अद्भुत जीवनशैली को बेहद संवेदनशीलता और प्रामाणिकता के साथ पर्दे पर उतारा है। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी और बैकग्राउंड म्यूजिक ने दर्शकों और राष्ट्रीय जूरी को मंत्रमुग्ध कर दिया, जिसके चलते इसे देश का सर्वोच्च फिल्म पुरस्कार हासिल हुआ।
छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को मिला वैश्विक मंच
इस राष्ट्रीय पुरस्कार के बाद छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोक कला और लोक आस्था को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई दृष्टि मिलेगी। जानकारों का मानना है कि इस तरह के दस्तावेजीकरण से न केवल नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ेगी, बल्कि छत्तीसगढ़ में सांस्कृतिक पर्यटन (Cultural Tourism) को भी बढ़ावा मिलेगा।
समूचा राज्य आज इस गौरवशाली क्षण पर ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष के साथ निर्देशक भरतबाला और रामनामी समाज के प्रति आभार व्यक्त कर रहा है, जिन्होंने छत्तीसगढ़ की माटी की खुशबू को देश के सर्वोच्च मंच तक पहुँचाया।
