झीरम घाटी मामले में न्याय की जीत, ऐतिहासिक फैसले का होना चाहिए स्वागत: मुख्यमंत्री विष्णु देव साय
“13 साल की लंबी कानूनी लड़ाई और 100 से अधिक गवाहों की गवाही के बाद आया कोर्ट का फैसला, इस पर राजनीति ठीक नहीं” — सीएम साय

विशेष संवाददाता, रायपुर 24 सितम्बर ।
छत्तीसगढ़ के इतिहास के सबसे खौफनाक और दिल दहला देने वाले झीरम घाटी हत्याकांड में जगदलपुर की विशेष एनआईए (NIA) अदालत द्वारा सभी 10 दोषियों को मृत्युदंड (फांसी की सजा) सुनाए जाने के बाद सूबे की सियासत गरमा गई है। इस ऐतिहासिक फैसले का पुरजोर स्वागत करते हुए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने इसे ‘न्याय की जीत’ करार दिया है। मुख्यमंत्री ने साफ शब्दों में कहा कि ने पूरे 13 साल तक इस संवेदनशील मामले की गहन सुनवाई की है और 100 से अधिक गवाहों के बयानों तथा पुख्ता सबूतों के आधार पर अदालत ने यह ऐतिहासिक निर्णय लिया है, इसलिए इस फैसले का दिल से स्वागत किया जाना चाहिए।
पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में बस्तर अब विकास की ओर अग्रसर
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने जांच एजेंसी एनआईए की कार्यप्रणाली की सराहना करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के सुदृढ़ नेतृत्व और लोह-संकल्प के कारण आज छत्तीसगढ़ माओवाद के चंगुल से मुक्त होने की कगार पर है। उन्होंने कहा, “दशकों तक नक्सली हिंसा का दंश झेलने वाला बस्तर अब शांति, विश्वास और चहुंमुखी विकास के एक नए युग की ओर कदम बढ़ा चुका है।” मुख्यमंत्री ने विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे सवालों पर तीखा पलटवार करते हुए यह संदेश दिया कि जब देश की सर्वोच्च जांच एजेंसियों में से एक और हमारी न्यायपालिका ने पूरी प्रक्रिया का पालन करते हुए न्याय किया है, तो इस पर राजनीति करना अनुचित है।
क्या था झीरम घाटी का वह काला दिन?
उल्लेखनीय है कि 25 मई 2013 को बस्तर की झीरम घाटी में नक्सलियों ने कांग्रेस की ‘परिवर्तन यात्रा’ के काफिले पर घात लगाकर एक भीषण और सुनियोजित हमला किया था। इस बर्बर हमले में तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, बस्तर के कद्दावर नेता महेंद्र कर्मा, और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत 32 लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई थी। नक्सलियों द्वारा किए गए इस बारूदी विस्फोट और अंधाधुंध गोलीबारी ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।
13 साल का लंबा सफर और अदालत का कड़ा फैसला
इस हत्याकांड के बाद देश और प्रदेश में लंबे समय तक इंसाफ की मांग उठती रही। एनआईए ने मामले की कमान संभाली और सितंबर 2014 में अपनी पहली चार्जशीट दाखिल की थी। 13 साल तक चली इस जटिल कानूनी प्रक्रिया के दौरान अदालत ने 101 गवाहों की गवाहियां दर्ज कीं। मामले में सुनवाई के दौरान एक आरोपी की मौत हो गई थी, जिसके बाद बचे सभी 10 आरोपियों को अदालत ने दोषी पाते हुए फांसी की सजा सुनाई है।
राजनीतिक घमासान: भाजपा का ‘न्याय’ बनाम कांग्रेस का ‘अधूरा सच’
अदालत के इस फैसले के बाद प्रदेश की राजनीति में बयानों के तीर चलने शुरू हो गए हैं। जहाँ मुख्यमंत्री विष्णु देव साय इसे पीड़ितों के परिवारों के लिए मुकम्मल न्याय बता रहे हैं, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और कांग्रेस के अन्य नेताओं ने इसे ‘अधूरा न्याय’ करार दिया है। कांग्रेस का आरोप है कि इस नरसंहार के पीछे की ‘बड़ी राजनीतिक साजिश’ और मुख्य सूत्रधार (मास्टरमाइंड) अभी भी गिरफ्त से बाहर हैं। इस पर पलटवार करते हुए भाजपा और सरकार के मंत्रियों का कहना है कि कांग्रेस इस संवेदनशील मुद्दे का राजनीतिकरण करना बंद करे और न्यायालय के फैसले का सम्मान करे।
बहरहाल, 13 साल के लंबे इंतजार के बाद आए इस फैसले ने बस्तर के शहीदों के जख्मों पर कुछ हद तक न्याय का मरहम जरूर लगाया है, लेकिन छत्तीसगढ़ की सियासी फिजां में झीरम घाटी की गूंज अभी शांत होती नहीं दिख रही है।
