माटी की महक और लोक आस्था का महापर्व: छत्तीसगढ़ में ‘हरेली तिहार’
रायपुर 10 अगस्त : धान के कटोरे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान, लोक आस्था और हरियाली से जुड़े पहले पर्व ‘हरेली तिहार’ पर पूरा प्रदेश उल्लास में डूबा हुआ है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में प्रदेश सरकार द्वारा ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों के मान-सम्मान को सर्वोपरि रखते हुए पिछले ढाई वर्षों में लिए गए नीतिगत फैसलों ने खेती-किसानी को एक नया संबल दिया है। कृषि संस्कृति को सहेजते हुए सरकार ने अन्नदाताओं के आर्थिक सुदृढ़ीकरण की दिशा में ऐतिहासिक मील के पत्थर स्थापित किए हैं।

अन्नदाताओं का बढ़ता मान: रिकॉर्ड धान खरीदी और बकाया बोनस
प्रदेश के किसानों को उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करने के लिए सरकार हरसंभव कदम उठा रही है। बीते खरीफ विपणन वर्ष में सरकार ने पंजीकृत किसानों से समर्थन मूल्य पर 141.05 लाख मीट्रिक टन धान की बंपर खरीदी की। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान की खरीदी 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से सुनिश्चित की गई है।
इसके साथ ही, रमन सरकार के कार्यकाल के पिछले दो वर्षों के बकाया धान बोनस के रूप में 3,716.38 करोड़ रुपये सीधे किसानों के खातों में अंतरित कर उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया गया है। मुख्यमंत्री का स्पष्ट मानना है कि “भारत गांवों में बसता है और जब किसान खुशहाल होगा, तभी प्रदेश का व्यापार और उद्योग फलेगा-फूलएगा।”
प्रकृति वंदना और कृषि यंत्रों का अनुष्ठान
सावन मास की अमावस्या को आने वाली हरेली प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है। इस दिन ग्रामीण अंचलों में गजब का उत्साह देखने को मिलता है:
- गोवर्धन पूजा और आरोग्य रक्षा: पनघटों पर किसानों ने अपने गोधन (गाय, बैल, बछड़ों) को नहलाया। पशुओं के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए वनांचल से लाई गई जड़ी-बूटियों (कंदमूल) को उबालकर और अरंडी/खम्हार के पत्तों में लपेटकर विशेष वनौषधि खिलाई गई।
- शस्त्र-पूजा की तर्ज पर कृषि यंत्र वंदना: किसानों ने अपने हल (नांगर), कुदाली, फावड़ा, गैंती और टंगिया जैसे कृषि उपकरणों की साफ-सफाई कर आंगन में मुरूम बिछाकर उनकी विधि-विधान से पूजा की।
- पारंपरिक पकवान: घरों में माताओं ने गुड़ का चीला, गुलगुल भजिया और गुड़हा चीला जैसे लजीज छत्तीसगढ़ी व्यंजन बनाए, जिनका देवताओं और कृषि औजारों को भोग लगाया गया।
गेड़ी की गूंज और लोक खेलों का रोमांच
हरेली तिहार का सबसे बड़ा आकर्षण बांस से निर्मित ‘गेड़ी’ है। गांव के बच्चों और युवाओं ने बांस से बनी गेड़ी पर चढ़कर गली-मोहल्लों का भ्रमण किया। गेड़ी के चलने से निकलने वाली ‘रच-रच’ की पारंपरिक ध्वनि ने पूरे वातावरण को जीवंत बना दिया।
शाम होते ही गांवों के खेल मैदानों में पारंपरिक खेलकूद का दौर शुरू हो गया। युवाओं ने कबड्डी और नारियल फेंक प्रतियोगिता में दम दिखाया, तो वहीं बहु-बेटीयों ने सावन झूला, बिल्लस, खो-खो और फुगड़ी का आनंद लिया। इसके अलावा पौनी-पसारी व्यवस्था के तहत राउत, लोहार और बैगाओं ने घर-घर जाकर नीम की पत्तियां खोंचीं और लोहारों ने चौखट पर कील गाड़कर अनिष्ट की आशंकाओं को दूर करने की पारंपरिक रस्म निभाई।
सामाजिक समरसता का जीवंत प्रतीक
हरेली केवल कृषि या धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की सामाजिक समरसता और भाईचारे का सबसे बड़ा प्रतीक है। यह पर्व समाज के हर वर्ग को एक धागे में पिरोता है। प्रकृति, पशुधन और परंपराओं के प्रति यह अगाध प्रेम ही छत्तीसगढ़ को देश-दुनिया में अनूठा बनाता है।
