रायपुर, 04 अगस्त 2026: प्रदेशभर में हर नवजात को जीवन की स्वस्थ और सुरक्षित शुरुआत देने के संकल्प के साथ ‘विश्व स्तनपान सप्ताह’ का विधिवत शुभारंभ हो गया है। स्वास्थ्य विभाग के तत्वावधान में राज्यभर के अस्पतालों, सामुदायिक व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों में विशेष जागरूकता अभियानों का दौर शुरू हो गया है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य माताओं और उनके परिजनों को स्तनपान के वैज्ञानिक और जीवनरक्षक महत्व के प्रति जागरूक करना है।

जन्म के पहले घंटे का महत्व और ‘कोलोस्ट्रम’ की ताकत
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, शिशु के जन्म लेते ही पहले घंटे के भीतर स्तनपान शुरू करना और पहले छह माह तक केवल मां का दूध पिलाना बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास की सबसे मजबूत नींव है। मां का पहला गाढ़ा पीला दूध यानी ‘कोलोस्ट्रम’ नवजात के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यह प्राकृतिक सुरक्षा कवच शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) को तेजी से मजबूत करता है, संक्रमण से बचाता है और कुपोषण के खतरे को कोसों दूर रखता है। छह महीने के बाद शिशु को पौष्टिक ऊपरी आहार के साथ-साथ कम से कम दो साल तक स्तनपान जारी रखना चाहिए।
मां के स्वास्थ्य के लिए भी है वरदान
स्तनपान केवल शिशु के लिए ही नहीं, बल्कि नई मां के स्वास्थ्य के लिए भी बेहद फायदेमंद है। इससे प्रसव के बाद महिलाओं के शरीर को रिकवर होने में मदद मिलती है, कई गंभीर बीमारियों का जोखिम घटता है तथा मां और बच्चे के बीच का भावनात्मक रिश्ता और अधिक प्रगाढ़ होता है।
मैदानी स्तर पर युद्धस्तर पर गतिविधियां
सप्ताहभर चलने वाले इस आयोजन के तहत स्वास्थ्य संस्थानों में निम्नलिखित विशेष गतिविधियां संचालित की जा रही हैं:
- गर्भवती एवं धात्री माताओं की विशेष काउंसलिंग और स्वास्थ्य शिक्षा सत्र।
- मितानिनों और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा घर-घर जाकर सही स्तनपान तकनीकों की जानकारी।
- स्तनपान से जुड़े पुराने अंधविश्वासों और भ्रमों का वैज्ञानिक समाधान।
- माताओं और परिजनों के बीच समूह चर्चा व प्रश्नोत्तर कार्यक्रम।
पूरे परिवार की साझा जिम्मेदारी है स्तनपान
विशेषज्ञों का मानना है कि स्तनपान को केवल मां की अकेली जिम्मेदारी नहीं माना जाना चाहिए। इसमें पूरे परिवार का सहयोग, सकारात्मक पारिवारिक माहौल और सही जानकारी बेहद जरूरी है। जनभागीदारी के इस महाअभियान से न केवल मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार होगा, बल्कि एक कुपोषण-मुक्त और स्वस्थ छत्तीसगढ़ के निर्माण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम आगे बढ़ेगा।
