मुख्य बिंदु
- ऐतिहासिक कायापलट: भूजल संसाधन आकलन-2026 में छत्तीसगढ़ का अब तक का सबसे बड़ा एक-चक्रीय सुधार, संकटग्रस्त ‘क्रिटिकल’ विकासखंडों की संख्या शून्य हुई।
- सर्वोच्च भूजल रिचार्ज: प्रदेश का वार्षिक भूजल रिचार्ज बढ़कर अब तक के सर्वोच्च रिकॉर्ड 14.65 BCM (बिलियन घन मीटर) पर पहुंचा।
- दोहन में ऐतिहासिक गिरावट: जल संरक्षण के इतिहास में पहली बार भूजल दोहन की वार्षिक दर में आई भारी कमी (6.30 BCM से घटकर 6.21 BCM)।
- प्रधानमंत्री मोदी के आह्वान का असर: ‘जन शक्ति से जल शक्ति’ और ‘जल संचय जन भागीदारी’ अभियान बना छत्तीसगढ़ में जल क्रांति का आधार।

रायपुर, 9 सितंबर 2026: जल प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में छत्तीसगढ़ ने मील का पत्थर पार करते हुए देश के सामने एक नया इतिहास रच दिया है। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड और राज्य भूजल सर्वेक्षण मंडल द्वारा संयुक्त रूप से तैयार भूजल संसाधन आकलन-2026 के जो आधिकारिक आंकड़े सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले और बेहद सुकून देने वाले हैं। इन आंकड़ों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में अब एक भी विकासखंड भूजल दोहन की ‘क्रिटिकल’ (संकटग्रस्त) श्रेणी में नहीं बचा है।
विकासखंडवार भूजल आकलन के इतिहास में छत्तीसगढ़ का यह अब तक का सबसे बड़ा और अभूतपूर्व सुधार चक्र है। आपको बता दें कि वर्ष 2020 में प्रदेश के 9 विकासखंड क्रिटिकल श्रेणी में आते थे। वर्ष 2025 तक भी 5 विकासखंड इस श्रेणी में संघर्ष कर रहे थे, लेकिन वर्ष 2026 के ताजा आकलन ने कमाल कर दिया है—ये सभी पांचों विकासखंड अब क्रिटिकल जोन से पूरी तरह बाहर आ चुके हैं। इसके साथ ही प्रदेश में सुरक्षित विकासखंडों की संख्या बढ़कर 127 हो गई है।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय का संदेश: “यह महानदी भवन का नहीं, खेतों और गांवों के पसीने का परिणाम है”
इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर प्रदेशवासियों को बधाई देते हुए मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के प्रति गहरा आभार व्यक्त किया है। उन्होंने कहा—
“प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के ‘जन शक्ति से जल शक्ति’ के आह्वान और उनके दूरदर्शी ‘जल संचय जन भागीदारी’ अभियान ने छत्तीसगढ़ में जल संरक्षण के प्रयासों को एक नई जन-क्रांति का रूप दे दिया है। यह सफलता केवल सरकारी बैठकों या महानदी भवन की फाइलों में नहीं, बल्कि खेतों और गांवों की माटी में पसीने बहाने वाले किसानों और हमारे मैदानी अमले के सामूहिक संकल्प से हासिल हुई है।”
मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से बेमेतरा और राजनांदगांव के दूरदर्शी किसानों की सराहना की, जिन्होंने अपनी आने वाली पीढ़ियों की जल सुरक्षा के लिए खेती के पारंपरिक और पानी की अधिक खपत वाले तौर-तरीकों में स्वैच्छिक बदलाव स्वीकार किया।
भूजल रिचार्ज ने तोड़े सारे रिकॉर्ड, तालाबों से पुनर्भरण में 266% की उछाल
आकलन-2026 के आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि राज्य में पानी को जमीन के भीतर सहेजने के प्रयास किस कदर सफल रहे हैं:
- सर्वोच्च रिचार्ज: प्रदेश में वार्षिक भूजल रिचार्ज बढ़कर 14.65 BCM के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया है, जबकि वर्ष 2017 में यह केवल 11.57 BCM था।
- तालाबों की भूमिका: वर्ष 2020 की तुलना में तालाबों और पोखरों से होने वाले भूजल रिचार्ज में 266.9 प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्ज की गई है।
- विशाल संरचनाएं: पूरे प्रदेश में जल संचय अभियानों के तहत कुल 2 लाख 28 हजार 736 जल संरचनाएं दर्ज की गई हैं, जिन्होंने बारिश की एक-एक बूंद को जमीन में उतारने का बड़ा काम किया है।
फसल विविधीकरण से बेमेतरा और राजनांदगांव में चमत्कारी बदलाव
इस जल-सुधार के पीछे सबसे बड़ा गेम-चेंजर साबित हुआ है—फसल विविधीकरण और ग्रीष्मकालीन (गर्मी के) धान के रकबे में आई भारी कमी:
- बेमेतरा जिला: यहां गर्मी के धान का रकबा जो कभी लगभग 26 हजार हेक्टेयर हुआ करता था, घटकर अब मात्र 5 हजार हेक्टेयर रह गया है। लगातार चार चक्रों के बाद बेमेतरा क्रिटिकल जोन से बाहर आया है और कुल भूजल दोहन में 20 प्रतिशत की उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।
- राजनांदगांव जिला: वर्ष 2022 में जहां भूजल दोहन 70.5 प्रतिशत के खतरनाक स्तर तक पहुंच गया था, वह विकासखंड अब पूर्णतः सुरक्षित श्रेणी में लौट आया है। यहां गर्मी का धान 9,400 हेक्टेयर से घटकर लगभग 2,800 हेक्टेयर पर आ गया है।
अब अगला लक्ष्य: वर्ष 2030 तक हर विकासखंड पूरी तरह सुरक्षित
वर्तमान में प्रदेश के 11 जिलों के 19 विकासखंड अर्ध-संकटग्रस्त श्रेणी में हैं। सरकार की नीति साफ है कि इस सफलता के बाद रुकना नहीं है। राज्य सरकार ने वर्ष 2030 तक छत्तीसगढ़ के प्रत्येक विकासखंड को भूजल तनाव से मुक्त करने का बड़ा लक्ष्य तय किया है।
इस कड़ी में NAQUIM 2.0 के तहत जलभृत मानचित्रण (Aquifer Mapping) और विकासखंडवार मासिक लक्ष्यों के साथ ‘कैच द रेन’ योजना को और अधिक आक्रामक और लक्षित तरीके से जमीन पर उतारा जा रहा है।
छत्तीसगढ़ ने यह साबित कर दिया है कि जब प्रशासनिक दृढ़ता, वैज्ञानिक सोच और जनभागीदारी का त्रिवेणी संगम होता है, तो असंभव लगने वाले लक्ष्य भी यथार्थ बन जाते हैं।
