छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (UCC) पर महामंथन: आदिवासी संस्कृति के संरक्षण से लेकर लैंगिक समानता तक, दो दिवसीय उच्च स्तरीय बैठक में उठे तीखे और गंभीर मुद्दे

रायपुर, 11 सितंबर 2026: देश और राज्यभर में चर्चा का केंद्र बने समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) के क्रियान्वयन को लेकर छत्तीसगढ़ में सुगबुगाहट तेज हो गई है। राज्य स्तर पर गठित उच्च स्तरीय समिति द्वारा राजधानी के पुराने सर्किट हाउस सभाकक्ष में आयोजित दो दिवसीय मैराथन परामर्श बैठक सफलतापूर्वक संपन्न हो गई है। इस उच्च स्तरीय मंथन में विभिन्न सामाजिक संगठनों, आदिवासी प्रतिनिधियों, अल्पसंख्यक आयोग, महिला एवं बाल अधिकार संगठनों, न्यायविदों और चिकित्सा जगत के दिग्गजों ने शिरकत कर अपनी दो टूक राय रखी।

मुख्य आकर्षण और तकनीकी सत्र
- अध्यक्षता एवं प्रस्तुतिकरण: बैठक की अध्यक्षता भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी एवं समिति के सदस्य श्री एम. के. राउत ने की। उन्होंने पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन (PPT) के माध्यम से यूसीसी के वर्तमान कानूनी प्रावधानों, नियमों और इसके दूरगामी प्रभावों की एक-एक बारीकी को उपस्थित प्रतिनिधियों के सामने रखा।
- कानूनी मार्गदर्शन: समिति के सदस्य एवं प्रतिष्ठित वरिष्ठ अधिवक्ता श्री मोहन पवार ने चर्चा के दौरान विधिक जटिलताओं पर कानूनी दृष्टिकोण साझा किए।
- कोर एजेंडा: दो दिनों तक चले इस गहन और संवेदनशील मंथन का मुख्य केंद्र-बिंदु समाज के चार सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ रहे— विवाह और तलाक के नियम, उत्तराधिकार और पैतृक संपत्ति में अधिकार, भरण-पोषण (Alimony) तथा लिव-इन रिलेशनशिप के कानूनी पहलू।

विभिन्न वर्गों की महा-बहस: विरोधाभास और अनूठे सुझाव
बैठक के दौरान समाज के विभिन्न वर्गों से जिस तरह के सुझाव सामने आए, उन्होंने इस पूरे मुद्दे की जटिलता और व्यापकता को उजागर कर दिया:
1. आदिवासी अस्मिता और परंपराओं का सवाल
- गोंडी धर्म संस्कृति संरक्षण समिति के प्रांतीय सचिव श्री गजानंद नुरूटी ने आदिवासी समाज के विशिष्ट सांस्कृतिक ताने-बाने और प्राचीन रूढ़िगत परंपराओं की रक्षा का मुद्दा पूरी शिद्दत से उठाया। उन्होंने दो टूक शब्दों में मांग की कि आदिवासी समुदाय की मौलिक पहचान, संस्कृति और अधिकारों को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए उन्हें समान नागरिक संहिता के दायरे से पूरी तरह पृथक रखा जाए।
2. लैंगिक समानता और महिला अधिकारों की जोरदार पैरवी
- राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष श्री अमरजीत सिंह छाबड़ा ने समाज में आधुनिकता और समानता का पक्ष मजबूती से रखा। उन्होंने पुरजोर वकालत करते हुए कहा कि महिला और पुरुष को समान कानूनी अधिकार मिलने चाहिए। इसके तहत बेटे और बेटी को संपत्ति में बराबर का उत्तराधिकार, विवाह व तलाक का अनिवार्य पंजीयन और वसीयत से जुड़े सख्त व स्पष्ट कानूनी प्रावधान स्थापित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
3. नैतिक मूल्य और पारिवारिक संस्था का पक्ष
- क्रिश्चियन समाज के प्रतिनिधि श्री राजेश जॉन पाल ने अपने संबोधन में पारिवारिक मूल्यों पर जोर देते हुए कहा कि विवाह को ईश्वर द्वारा बनाया गया एक अटूट बंधन माना जाता है, जिसे तोड़ा नहीं जा सकता। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह भी कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप जैसे पश्चिमी प्रभाव वाले संबंध भारतीय समाज और संस्कृति के अनुकूल नहीं हैं, और इन्हें समाज द्वारा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
4. कानूनविदों और बुद्धिजीवियों का विधिक दृष्टिकोण
- अधिवक्ता संघ के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री बृजेश पांडेय, अध्यक्ष श्री दिनेश देवांगन, अधिवक्ता परिषद के अध्यक्ष श्री प्रमोद तिवारी और वरिष्ठ उपाध्यक्ष श्रीमती भारती राठौर ने एक स्वर में कहा कि यदि यूसीसी लागू होता है, तो इसके प्रावधान इतने स्पष्ट, पारदर्शी और व्यावहारिक होने चाहिए कि भविष्य में किसी भी प्रकार के कानूनी विवाद की गुंजाइश न बचे।
- कान्यकुब्ज ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष डॉ. सुरेश मिश्रा तथा श्री आशीष बाजपेयी ने भी अपने बहुमूल्य अभिमत समिति के समक्ष दर्ज कराए।
5. बाल सुरक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र की राय
- राज्य बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष श्रीमती वर्णिका शर्मा ने बच्चों के कानूनी अधिकारों, उनकी कस्टडी और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े बेहद संवेदनशील पहलुओं को समिति के समक्ष रखा।
- दूसरी ओर, मेडिकल एसोसिएशन के प्रतिनिधि डॉ. कुलदीप सोलंकी, डॉ. सुरभि दुबे और डॉ. के.पी. आजमानी ने भी अपने पेशेवर अनुभवों के आधार पर यूसीसी के क्रियान्वयन पर अपने चिकित्सीय एवं सामाजिक सुझाव साझा किए।
समिति का कड़ा रुख और आगे की राह
दो दिनों तक चली इस मैराथन बैठक में सभी पक्षों को बेहद धैर्य, गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ सुना गया। समिति के सदस्यों ने सभी प्रतिनिधियों को आश्वस्त किया है कि इस मंथन से निकले एक-एक व्यावहारिक तथ्य, विरोधाभास और सुझाव का सूक्ष्मता से विश्लेषण किया जाएगा।
छत्तीसगढ़ में यूसीसी पर हो रही यह उच्च स्तरीय कवायद यह दर्शाती है कि सरकार बिना किसी जल्दबाजी के, समाज के हर वर्ग की भावनाओं, परंपराओं और अधिकारों को संतुलित करते हुए एक समावेशी, व्यावहारिक और निष्पक्ष मसौदा तैयार करने की दिशा में पूरी गंभीरता से आगे बढ़ रही है।
