छत्तीसगढ़ की आधी आबादी का भूगोल: बजटीय प्राथमिकताओं की कसौटी पर वनांचल की कमान और मैदानों का यथार्थ
– संजीव ठाकुर (वरिष्ठ नीति विश्लेषक एवं सामाजिक विचारक)
छत्तीसगढ़ को ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है, लेकिन इस कटोरे को सींचने वाले हाथों की असली कहानी भौगोलिक विविधताओं के बीच बंटी हुई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) और राज्य के नवीनतम बजट (2026-27) के आंकड़े यह साफ करते हैं कि बस्तर के वनांचल की आदिवासी महिलाओं और महानदी बेसिन के मैदानी क्षेत्रों की ग्रामीण महिलाओं के संघर्ष, सामर्थ्य और बजट प्राथमिकताओं में भारी असमानता है। हाल ही में विधानसभा में प्रस्तुत ₹1.72 लाख करोड़ के राज्य बजट में महिला केंद्रित योजनाओं के लिए किए गए भारी-भरकम वित्तीय आवंटन और नई योजनाओं की जमीनी समीक्षा करना अब बेहद जरूरी हो गया है।

सांख्यिकीय यथार्थ: एक तुलनात्मक दृष्टिकोण
दोनों क्षेत्रों की जमीनी हकीकत को समझने के लिए स्वास्थ्य, श्रम और बजट से जुड़े इन आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है:
| विकास के पैमाने | बस्तर संभाग (वनांचल क्षेत्र) | मैदानी क्षेत्र (महानदी बेसिन) |
|---|---|---|
| महिला श्रम बल सहभागिता (LFPR) | ~78% – 82% (अत्यधिक उच्च) | ~45% – 52% (मध्यम) |
| एनीमिया (रक्तअल्पता) की दर | ~67.4% (गंभीर महामारी स्तर) | ~54.2% (चिंताजनक) |
| संपत्ति पंजीकरण छूट का लाभ | दूरदराज पट्टे होने से लाभ सीमित | महिलाओं के नाम पर रजिस्ट्री में 50% छूट का सीधा लाभ |
| राजनीतिक निर्णय क्षमता | पारंपरिक समाज में महिला का दखल अधिक | ‘सरपंच-पति’ संस्कृति का भारी प्रभाव |
| स्कूल ड्रॉप-आउट दर (10वीं के बाद) | ~38% (दूरी और सुरक्षा मुख्य कारण) | ~24% (घरेलू काम और जल्दी विवाह) |
१. आर्थिक धरातल: श्रम का बाहुल्य बनाम अधिकारों का शून्य
बस्तर और सरगुजा के वनांचलों में महिलाओं की श्रम बल सहभागिता (LFPR) देश में सबसे अधिक है। महुआ, इमली, टोरा और चार जैसी लघु वनोपज (NTFP) का संग्रहण पूरी तरह से महिला केंद्रित है। सुबह 4 बजे से टोकनी उठाए जंगलों की ओर रुख करती ये महिलाएं बस्तर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। इसके विपरीत, मैदानी क्षेत्रों में महिलाएं मुख्य रूप से धान की रोपाई, निंदाई और लुआई जैसे पारंपरिक कृषि कार्यों से जुड़ी हैं।
विडंबना यह है कि ‘कृषि के इस महिलाकरण’ (Feminization of Agriculture) के बावजूद दोनों ही क्षेत्रों में भूमि का मालिकाना हक पुरुषों के पास है। राज्य सरकार ने बजट 2026-27 में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए अचल संपत्ति (Immovable Property) की रजिस्ट्री फीस में 50% की भारी छूट देने का ऐतिहासिक प्रावधान किया है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि मैदानी क्षेत्रों की शहरी या मध्यम-वर्गीय महिलाएं तो इस छूट का लाभ उठा रही हैं, पर बस्तर के सुदूर वनांचलों में महिलाओं के नाम पर पट्टे या जमीनों का ट्रांसफर न होने के कारण यह महत्वाकांक्षी बजटीय रियायत उनके लिए बेअसर साबित हो रही है।
२. नई ‘रानी दुर्गावती योजना’: पात्रता की कसौटी और जमीनी राह
बजट 2026-27 की सबसे बड़ी और नई घोषणा ‘रानी दुर्गावती योजना’ है, जिसके लिए शुरुआती तौर पर ₹15 करोड़ का बजट प्रावधान किया गया है। इसके तहत गरीब परिवारों की बेटियों को 18 वर्ष की आयु पूरी करने पर ₹1.5 लाख की एकमुश्त वित्तीय सहायता दी जाएगी।
योजना के कड़े पात्रता मानदंड:
- मूल निवास व जन्म तिथि: लाभार्थी परिवार का छत्तीसगढ़ राज्य का स्थायी निवासी होना अनिवार्य है। यह लाभ 1 अप्रैल 2026 के बाद जन्म लेने वाली बेटियों को ही मिलेगा।
- आर्थिक श्रेणी (BPL): यह योजना विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर और गरीबी रेखा से नीचे (BPL) जीवन यापन करने वाले परिवारों के लिए ही लक्षित है, जिसके लिए वैध बीपीएल राशन कार्ड अनिवार्य होगा।
- प्रक्रिया और संचय: बेटी के जन्म के समय ही पंजीकरण कराकर ‘फाइनेंशियल एश्योरेंस सर्टिफिकेट’ जारी किया जाएगा। सरकार इस राशि को सुरक्षित फंड में रखेगी और 18 वर्ष पूर्ण होने पर उच्च शिक्षा या विवाह हेतु एकमुश्त जारी करेगी।
समीक्षा: मैदानी क्षेत्रों में यह बाल विवाह रोकने में बड़ी भूमिका निभाएगी, लेकिन बस्तर के अंदरूनी इलाकों में जहां जन्म पंजीकरण और बीपीएल कार्डों के डिजिटलीकरण में आज भी व्यावहारिक खामियां हैं, वहां सुदूर अंचलों की बेटियों को इस अधिकार से वंचित होने से बचाना एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती होगी।
३. बस्तर संभाग: बुनियादी बजटीय आवंटन और महिलाओं पर प्रभाव
इस वर्ष के बजट का एक बड़ा हिस्सा बस्तर संभाग के कायाकल्प और उसे मुख्यधारा से जोड़ने के लिए बुनियादी ढांचे पर केंद्रित है। हालांकि ये योजनाएं सीधे तौर पर महिला विभाग की नहीं हैं, पर इनका सबसे गहरा असर ग्रामीण महिलाओं के दैनिक जीवन पर पड़ेगा:
- शिक्षा का नया सवेरा (₹100 करोड़): बस्तर के संवेदनशील क्षेत्रों—अबूझमाड़ और जगरगुंडा में दो अत्याधुनिक ‘एजुकेशन सिटीज’ (Education Cities) की स्थापना के लिए ₹100 करोड़ आवंटित किए गए हैं। यह कदम 10वीं के बाद बस्तर की बेटियों की सुरक्षा और दूरी के कारण होने वाले ~38% के भारी-भरकम ड्रॉप-आउट (Drop-out) को रोकने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
- स्वास्थ्य और चिकित्सा विस्तार (₹50 करोड़): सुदूर अंचल में मातृ मृत्यु दर (MMR) पर लगाम लगाने और संस्थागत प्रसव को सुगम बनाने के लिए दंतेवाड़ा सहित तीन क्षेत्रों में नए मेडिकल कॉलेजों के संचालन हेतु बजटीय आवंटन किया गया है।
- सिंचाई और जल सुरक्षा (₹2,024 करोड़): इंद्रावती नदी पर मातनार और देउरगांव बैराज के निर्माण के लिए ₹2,024 करोड़ का भारी निवेश प्रस्तावित है। जब खेतों तक पानी पहुंचेगा, तो पुरुष पलायन रुकेगा और ग्रामीण महिलाओं पर खेती व अकेले परिवार संभालने का दोहरा मानसिक व शारीरिक बोझ कम होगा।
- आजीविका और पोषण पूरक (₹15 करोड़): बस्तर में महिलाओं की आय बढ़ाने के लिए बकरी पालन, सुअर पालन और मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने हेतु ₹15 करोड़ का विशेष फंड दिया गया है। साथ ही पूरक पोषण कार्यक्रम के लिए अलग से ₹15 करोड़ का प्रावधान है।
💡 नीतिगत रोडमैप: अब क्या बदलाव जरूरी हैं?
यदि छत्तीसगढ़ को वास्तव में महिलाओं के नेतृत्व वाला विकास (Women-led Development) हासिल करना है, तो बजट और नीतियों के ऊंचे ढांचों को इन व्यावहारिक धरातलों पर कसना होगा:
- राजस्व पट्टों पर अनिवार्य संयुक्त मालिकाना हक: संपत्ति रजिस्ट्री में दी गई 50% की छूट का लाभ ग्रामीण इलाकों तक पहुंचाने के लिए कृषि इनपुट सब्सिडी और पीएम आवास का आवंटन तभी मान्य हो, जब भूमि में महिला का नाम संयुक्त रूप से दर्ज हो।
- ‘सरपंच-पति’ प्रथा पर दंडात्मक कानून: बिहार की तर्ज पर छत्तीसगढ़ पंचायती राज अधिनियम में संशोधन किया जाए। यदि कोई पुरुष अपनी जनप्रतिनिधि पत्नी के कार्यों में हस्तक्षेप करता पाया जाए, तो उस पुरुष पर दंडात्मक कार्रवाई हो और संबंधित पंचायत सचिव को तत्काल बर्खास्त किया जाए।
- हाट-बाज़ार न्यूट्रि-क्लीनिक्स का विस्तार: महिलाओं व बच्चों के पोषण स्तर को सुधारने के लिए आवंटित ₹2,320 करोड़ के भारी बजट का एक हिस्सा साप्ताहिक हाट-बाजारों में विशेष ‘न्यूट्रि-क्लीनिक विंग’ बनाने में लगाया जाए। यहाँ एनीमिया पीड़ित महिलाओं को स्थानीय मिलेट्स (कोदो, कुटकी, रागी) से बने पूरक पोषण उत्पाद सीधे वितरित किए जाएं।
- डिजिटल सखी और ONDC लिंकेज: ‘बिहान’ (BIHAN) राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत काम कर रही स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं के स्थानीय उत्पादों को बिचौलियों से बचाने के लिए ग्रामीण युवतियों को तकनीकी रूप से कुशल बनाया जाए। इन उत्पादों को सीधे ONDC (ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स) और प्रमुख ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स से जोड़ा जाए ताकि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें।
छत्तीसगढ़ की ग्रामीण महिला केवल एक ‘वोट बैंक’ या योजना की ‘लाभार्थी’ नहीं है; वह इस राज्य की असली उत्पादक शक्ति है। जब तक हम बजट के क्रियान्वयन को बस्तर की भौगोलिक चुनौतियों और मैदानों की सामाजिक विसंगतियों के अनुरूप कस्टमाइज़ (Customize) नहीं करेंगे, तब तक सशक्तिकरण के दावे केवल कागजी आंकड़ों में सिमटे रहेंगे। आधी आबादी को उनका पूरा हक देना अब दया नहीं, राज्य का राजधर्म होना चाहिए।
