रायपुर, 06 अगस्त 2026 — छत्तीसगढ़ के जंगलों की फिजा अब बदल रही है। कभी सिर्फ पारंपरिक रूप से महुआ बीनकर अपनी आजीविका चलाने वाली आदिवासी और ग्रामीण महिलाएं अब आधुनिक प्रशिक्षण, मूल्यवर्धन (Value Addition) और सशक्त नेतृत्व के दम पर सफल उद्यमी बन रही हैं। केंद्र सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय और ट्राइफेड द्वारा वर्ष 2018 में शुरू की गई ‘प्रधानमंत्री वन धन विकास योजना’ छत्तीसगढ़ की महिलाओं के लिए वरदान साबित हो रही है। राज्य शासन की सक्रिय नीतियों के चलते आज महुआ सिर्फ एक वनोपज नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुका है।

राजनांदगांव का कोरिनभाठा: प्रेरणा का नया केंद्र
इस बदलाव की सबसे शानदार दास्तान राजनांदगांव जिले के कोरिनभाठा वन धन विकास केंद्र से सामने आई है। यहां की महिला स्व-सहायता समूहों ने पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर एक नई इबारत लिखी है। पहले जहां महिलाएं केवल कच्चा महुआ संग्रहित कर बेहद कम दामों पर बेचने को मजबूर थीं, वहीं आज वे विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में महुआ से उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद तैयार कर रही हैं।
कोरिनभाठा की महिलाओं द्वारा अब महुआ से लड्डू, कुकीज़ (बिस्कुट), एनर्जी बार, स्क्वैश और जैम जैसे स्वादिष्ट और पौष्टिक उत्पाद बनाए जा रहे हैं। आधुनिक प्रसंस्करण (Processing) और आकर्षक पैकेजिंग ने इन उत्पादों को शहरी बाजारों में भी प्रीमियम पहचान दिला दी है।
कौशल विकास और तकनीक ने बदली तस्वीर
वन धन विकास केंद्रों के माध्यम से महिलाओं को केवल उत्पाद निर्माण तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि उन्हें आधुनिक बाजार की हर बारीकी सिखाई जा रही है। इसमें शामिल हैं:
- गुणवत्ता नियंत्रण और स्वच्छता: खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुसार उत्पादों का निर्माण।
- आकर्षक पैकेजिंग और लेबलिंग: उत्पादों को बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाना।
- भंडारण और विपणन (Marketing): सही समय पर सही दाम पर उत्पादों की बिक्री की रणनीति।
इस व्यापक प्रशिक्षण के कारण अब महिलाओं को उनके उत्पादों का उचित और कई गुना अधिक मूल्य मिल रहा है, जिससे उनकी पारिवारिक आय में भारी बढ़ोतरी हुई है।
‘छत्तीसगढ़ हर्बल्स’ से मिल रहा है ग्लोबल मार्केट
तैयार उत्पादों को सही मंच और व्यापक बाजार उपलब्ध कराने में ‘छत्तीसगढ़ हर्बल्स’ की भूमिका बेहद अहम रही है। छत्तीसगढ़ राज्य लघु वन उत्पाद संघ की इस अनूठी पहल के जरिए वन क्षेत्रों में तैयार प्राकृतिक और शुद्ध उत्पादों को एक बड़ा बाजार मिल रहा है।
अब महिला समूहों द्वारा तैयार वन शहद, एलोवेरा जेल, हर्बल जूस, महुआ के स्वादिष्ट उत्पाद और आयुर्वेदिक तेल ‘छत्तीसगढ़ हर्बल्स’ के ब्रांड नेम से बाजार में धूम मचा रहे हैं। इससे न केवल आदिवासियों की आय सुरक्षित हुई है, बल्कि राज्य के वनोपज को राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान मिली है।
सशक्त नारी, सशक्त ग्रामीण अर्थव्यवस्था
महुआ के मूल्यवर्धन ने ग्रामीण अंचलों में रोजगार के नए और स्थायी द्वार खोल दिए हैं। कच्चे महुआ की बिक्री के मुकाबले इसके फिनिश्ड प्रोडक्ट्स (तैयार उत्पादों) की मांग बाजार में लगातार बढ़ रही है।
कोरिनभाठा की महिलाओं की यह सफलता यह साबित करती है कि यदि हुनर को सही प्रशिक्षण, तकनीक और बाजार का सहयोग मिल जाए, तो वन संपदा ग्रामीण भारत की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल सकती है। आज यह योजना महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाकर नए भारत के निर्माण में मील का पत्थर साबित हो रही है।
