रायपुर 6 अगस्त / जशपुर टीबी (क्षय रोग) केवल एक शारीरिक बीमारी नहीं, बल्कि गरीबी, कुपोषण और सामाजिक उपेक्षा का एक ऐसा दुष्चक्र है जो हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ देता है। ऐसे कठिन समय में जब मरीज के सामने दवाइयों के साथ-साथ दो वक्त की पौष्टिक रोटी जुटाना भी एक बड़ी चुनौती बन जाता है, छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले से इंसानियत और सेवा की एक बेहद प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) में जिला डाटा प्रबंधक के रूप में कार्यरत निरंजन प्रसाद गुप्ता ने समाज के लिए एक मिसाल पेश करते हुए 60 टीबी रोगियों को गोद लिया है, जिनमें दूरस्थ अंचलों की विशेष पिछड़ी जनजाति (PVTG) के 19 मरीज भी शामिल हैं। उनके इस अनुकरणीय और समर्पित योगदान के लिए उन्हें दिसंबर 2024 में राज्य स्तरीय ‘निक्षय मित्र’ पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
चुनौतियों से भरा था रास्ता, पर जज्बा रहा अडिग
जशपुर जिले के दूरस्थ और दुर्गम इलाकों में निवासरत विशेष पिछड़ी जनजातियों—जैसे पहाड़ी कोरवा और बिरहोर—के बीच स्वास्थ्य सेवाओं और पोषण की स्थिति हमेशा से चिंता का विषय रही है। जागरूकता की कमी और संसाधनों के अभाव के कारण अक्सर इन क्षेत्रों में मरीज समय पर इलाज नहीं करवा पाते थे और बीच में ही दवा छोड़ देते थे।
इस विकट परिस्थिति को समझते हुए अक्टूबर 2024 में निरंजन प्रसाद गुप्ता ने प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत ‘निक्षय मित्र’ की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने केवल कागजों तक यह सेवा सीमित नहीं रखी, बल्कि धरातल पर उतरकर काम किया:
- पोषण आहार की निरंतरता: गोद लिए गए सभी 60 मरीजों को नियमित रूप से पौष्टिक आहार और राशन किट उपलब्ध कराई गई, जिससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) मजबूत हुई और वे तेजी से स्वस्थ होने की राह पर आगे बढ़े।
- घर-घर जाकर स्वास्थ्य संवाद: निरंजन ने स्वयं मरीजों के घर पहुंचकर उन्हें टीबी के लक्षणों, नियमित दवा सेवन (DOTS) के महत्व और संक्रमण से बचाव के उपायों के बारे में जागरूक किया।
- भय और भ्रांतियों का अंत: उनके सतत प्रयासों और संवाद का नतीजा यह रहा कि सुदूर वनांचल के इन समुदायों में स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति डर और झिझक खत्म हुई, और लोग खुद आगे आकर अस्पताल पहुंचने लगे।
कुपोषण और टीबी के दुष्चक्र को दी मात
चिकित्सक भी मानते हैं कि टीबी के इलाज में जितनी अहमियत दवाओं की होती है, उतनी ही पोषण की भी होती है। कुपोषण टीबी को बुलावा देता है और टीबी शरीर को और अधिक कुपोषित कर देती है। इस घातक चक्र को तोड़ने में ‘निक्षय मित्र’ योजना संजीवनी साबित हो रही है। निरंजन गुप्ता द्वारा दी जा रही निरंतर सहायता ने न केवल इन मरीजों की शारीरिक सेहत सुधारी है, बल्कि उनके मानसिक मनोबल को भी अटूट संबल दिया है।
बने समाज के प्रेरणास्त्रोत
प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान को सही मायनों में जन-आंदोलन बनाने का यह प्रयास यह साबित करता है कि बदलाव के लिए सिर्फ सरकारी नीतियां ही नहीं, बल्कि संवेदनशील दिलों और आगे बढ़कर जिम्मेदारी उठाने वाले नागरिकों की भी जरूरत होती है। जशपुर के इस प्रेरक प्रसंग ने यह दिखा दिया है कि यदि समाज का हर सक्षम व्यक्ति एक मरीज की भी जिम्मेदारी उठा ले, तो देश को टीबी मुक्त बनाने का संकल्प जल्द ही हकीकत बन सकता है।
“टीबी हारेगा, देश जीतेगा” के इस महाअभियान में आज जरूरत इस बात की है कि अधिक से अधिक लोग, स्वैच्छिक संस्थाएं और संगठन आगे आएं और ‘निक्षय मित्र’ बनकर किसी के जीवन की नई उम्मीद बनें।
