सुप्रीम कोर्ट के बाहर वकीलों का ‘महा-संग्राम’: मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सड़क पर उतरे अधिवक्ता, हिरासत के बाद रिहा
दिल्ली पुलिस और पैरामिलिट्री से तीखी झड़प, राजधानी में सियासी पारा गर्म; सुप्रीम कोर्ट की विशेष सुनवाई के बाद प्रशासन बैकफुट पर

विशेष संवाददाता, नई दिल्ली (12 अक्टूबर)
देश की सर्वोच्च अदालत के मुहाने पर शनिवार से शुरू हुआ वकीलों का आंदोलन सोमवार को एक नए और उग्र मोड़ पर पहुंच गया है。 मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और ‘विशेष गहन समीक्षा’ (SIR) के विरोध में जंतर-मंतर की तरफ कूच कर रहे सैकड़ों अधिवक्ताओं को दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों (CRPF) ने बेहद कड़े रुख के साथ रोक दिया। सुप्रीम कोर्ट और पटियाला हाउस कोर्ट से निकले वकीलों के इस जत्थे की भगवान दास रोड पर सुरक्षाबलों के साथ तीखी नोकझोंक और हाथापाई हुई, जिसके बाद वरिष्ठ और महिला वकीलों सहित दर्जनों प्रदर्शनकारियों को जबरन बसों में भरकर अज्ञात स्थानों पर हिरासत में ले लिया गया।

हालांकि, कानून के दिग्गजों की इस गैर-कानूनी नजरबंदी पर न्यायपालिका के कड़े रुख के बाद हिरासत में लिए गए सभी वकीलों को रिहा कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) और लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन (LAFC) ने पुलिसिया कार्रवाई की तीव्र निंदा की है।

सुप्रीम कोर्ट की रविवार को स्पेशल सुनवाई: केंद्र से जवाब तलब
इस पूरे घटनाक्रम पर सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए विशेष सुनवाई की। शीर्ष अदालत ने दिल्ली में लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 (पूर्ववर्ती धारा 144), इंटरनेट बंदी, और मेट्रो स्टेशनों के बंद द्वारों को लेकर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को आड़े हाथों लिया। अदालत ने साफ निर्देश दिए कि “वकीलों की आवाजाही को न रोका जाए और सुरक्षा के नाम पर अवैध हिरासत बर्दाश्त नहीं की जाएगी।” सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि कानून-व्यवस्था के तहत 10 अक्टूबर को दोपहर 2 बजे वकीलों को हटाया गया था और शाम 6 बजे तक उन्हें छोड़ दिया गया।

क्यों भड़का है वकीलों का यह आक्रोश?
अधिवक्ताओं के इस उग्र आंदोलन की मुख्य वजहें निम्नलिखित हैं:
- वोटर लिस्ट में हेरफेर का आरोप: वकीलों का दावा है कि चुनाव आयोग के विशेष नजरिए के कारण मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर विसंगतियां हैं。
- सीईसी के इस्तीफे की मांग: प्रदर्शनकारी अधिवक्ता मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के तुरंत इस्तीफे की मांग पर अड़े हैं।
- लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन: वकीलों का कहना है कि जब वे शांतिपूर्ण मार्च निकाल रहे थे, तो उन्हें हवाई जहाज और रास्तों से तानाशाही तरीके से रोका गया, जो अनुच्छेद 19 का सीधा उल्लंघन है。

बार एसोसिएशंस ने खोला मोर्चा, मामला पहुंचा स्वतंत्र जांच तक
वकीलों के साथ हुई बदसलूकी और मारपीट का मामला अब पूरी तरह कानूनी जंग में तब्दील हो चुका है। ‘सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन’ (SCAORA) ने इस मामले में सीधे केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस कमिश्नर और दिल्ली के उपराज्यपाल (LG) के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी है। याचिका में महिला वकीलों के साथ हुई अभद्रता और लाठीचार्ज की स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग की गई है
दूसरी तरफ, ‘लॉयर्स वॉयस’ नामक एक अन्य संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में एक काउंटर याचिका दायर कर शहर को ठप करने वाले इन राजनीतिक आंदोलनों पर आपत्ति जताई है, जिससे वकीलों की आजीविका प्रभावित हो रही है।
“वकील जब लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा के लिए बोलते हैं, तो वे अपने संवैधानिक अधिकार नहीं खो देते। शांतिपूर्ण आंदोलन को दबाना आपातकाल जैसी स्थिति है।”
— लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन (LAFC)
आंदोलन की अगली रूपरेखा: रिहा होने के बाद वकीलों के गुटों ने साफ कर दिया है कि पुलिसिया दमन से यह आंदोलन रुकने वाला नहीं है। आज यानी 12 अक्टूबर से सुप्रीम कोर्ट परिसर और इसके आसपास वकीलों का क्रमिक विरोध और कानूनी घेराबंदी जारी रहेगी, जिससे आने वाले दिनों में देश की राजधानी की सियासी और कानूनी हलचल और तेज होना तय है।
