छत्तीसगढ़ की माटी केवल अपनी खनिज संपदा और भौगोलिक सुंदरता के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि इसकी सबसे बड़ी पहचान इसकी समृद्ध लोक-संस्कृति, परंपराओं और पर्वों से है। यहाँ के लोक-जीवन में हर माह कोई न कोई त्यौहार लोक-मानस को अपने रंगों में रंग लेता है। सावन मास की अमावस्या यानी हरियाली अमावस्या पर मनाया जाने वाला ‘हरेली तिहार’ छत्तीसगढ़ का सबसे पहला और सर्वप्रमुख लोक-पर्व है। यह पर्व महज एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि, पर्यावरण और जीव-जंतुओं के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त करने का जीवंत दस्तावेज है।

1. हरेली: प्रकृति के हरियाणें और संस्कृति का संगम
‘हरेली’ शब्द मूल रूप से ‘हरियाली’ से बना है। सावन के महीने में जब धरा अंचल पर मखमली हरी चादर बिछ जाती है, खेत लहलहा उठते हैं और चारों तरफ जीवन ऊर्जा का संचार होता है, तब किसान इस पर्व को उल्लास के साथ मनाते हैं। यह छत्तीसगढ़ के वार्षिक लोक-पर्वों की श्रृंखला का श्रीगणेश है।
भौतिकता की इस चकाचौंधभरी दुनिया में हरेली का हरापन हमारे संस्कारों में प्राकृतिक हरीतिमा का सीधा अहसास कराता है। यह पर्व इस बात का प्रतीक है कि हमारी माटी की सोंधी-सोंधी महक और पारंपरिक खेल-कूद की धारा हमेशा निरंतर गतिमान बनी रहे।
2. कृषि उपकरणों और पशुधन का वंदन
हरेली का दिन पूरी तरह से अन्नदाताओं और उनके सच्चे सहयोगियों को समर्पित होता है:
- कृषि यंत्रों की आध्यात्मिक पूजा: छत्तीसगढ़ की कृषि विरासत की गहरी जड़ों को समेटे हुए इस दिन किसान अपने तमाम कृषि औजारों—जैसे हल, फावड़ा, कुदाल, कुम्हड़ी, बसुला, हथौड़ी, आरी, असिया, खुरपी और पैसुल आदि—की विशेष पूजा करते हैं। इन उपकरणों को धोकर स्वच्छ मुरमी मिट्टी के आसन पर सजाया जाता है। चावल के आटे से ‘हाथा’ लगाकर, चंदन, फूल, धूप-दीप और गुड़ के चीले का भोग लगाकर किसान धरती पुत्र बलराम रूपी हल का आभार जताते हैं:“हे बलराम रूपी हल प्रचण्ड शक्ति के प्रतीक! बोनी, ब्यासी और रोपा का कार्य संपन्न हो चुका है, अब आप विश्राम करें। हमने आपसे काम लिया, हमें क्षमा करें और आपकी दया हम पर सदैव बनी रहे।”
- गोधन की सेवा और पारंपरिक टीकाकरण: छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले गाय और बैलों की इस दिन विशेष सेवा की जाती है। उन्हें नहला-धुलाकर आरती उतारी जाती है और ‘गहूंता’ (आटा, नमक और जड़ी-बूटियों का पौष्टिक मिश्रण) खिलाया जाता है। विशेषज्ञता से भरपूर इस परंपरा में अरण्ड (एंडी) और खम्हार के पत्तों में नमक और अनाज के साथ विशेष औषधियां मिलाकर पशुओं को दी जाती हैं, जो वायुजनित रोगों से उनकी रक्षा करती हैं। यह ग्रामीण भारत का एक प्राचीन और बेहद प्रभावी पारंपरिक टीकाकरण है।
3. परंपरा, रोमांच और उल्लास के रंग
हरेली तिहार केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अंचल के पारंपरिक खेलों और उमंग का भी बड़ा केंद्र है:
- गेड़ी चढ़ने का रोमांच: बांस के लंबे डंडों और पहुयों से तैयार की जाने वाली ‘गेड़ी’ इस पर्व का मुख्य आकर्षण है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण और बलदाऊ भी अपने सखाओं के साथ गेड़ी चढ़ा करते थे। बरसात के दिनों में कीचड़ भरे रास्तों पर चलने के साधन के रूप में शुरू हुई यह परंपरा आज एक रोमांचक और लोकप्रिय खेल बन चुकी है, जिसमें गेड़ी दौड़ और संतुलन के विभिन्न करतब दिखाए जाते हैं।
- नारियल फेंक प्रतियोगिता और लोक-क्रीड़ाएं: गाँव-गाँव और शहर-शहर के चौराहों पर सुबह से ही युवाओं की टोलियां नारियल फेंक प्रतियोगिता में जुट जाती हैं। इसके साथ ही खो-खो, फुगड़ी, बिल्लस, अत्ती-पत्ती और डंडा पचरंगा जैसे पारंपरिक खेल इस दिन की रौनक कई गुना बढ़ा देते हैं।
- टोटका और लोक-सुरक्षा का विधान: लोक-मान्यताओं के अनुसार, गाँव और घरों को बुरी नजर व बीमारियों से बचाने के लिए चौखट पर नीम की पत्तियां और लोहे की कीलें लगाई जाती हैं। यह वैज्ञानिक रूप से नीम के औषधीय गुणों और पारंपरिक स्वास्थ्य रक्षा प्रणालियों से जुड़ा हुआ है।
- स्वादिष्ट छत्तीसगढ़ी पकवान: इस पावन अवसर पर घरों में पारंपरिक व्यंजनों की महक फैल जाती है। गुड़हा चीला, अईरसा, चौसेला, बोबरा, गुलगुला भजिया, सोहारी, बड़ा, ठेठरी और खुरमी जैसे पकवान बनाए जाते हैं, जिनका सबसे पहले गोधन और कृषि औजारों को भोग लगाया जाता है।
4. आज के परिप्रेक्ष्य में हरेली का महत्व
आधुनिक दौर में जहाँ दुनिया अपनी जड़ों से दूर हो रही है, वहीं छत्तीसगढ़ में हरेली तिहार अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को जीवंत रखे हुए है। राज्य सरकार द्वारा इस पर्व पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करने और ‘छत्तीसगढ़िया संस्कृति’ के तहत गेड़ी जैसे पारंपरिक खेलों को पुनर्जीवित करने के लिए उठाए गए कदम अत्यंत सराहनीय हैं।
हरेली तिहार हमें यह संदेश देता है कि प्रगति की दौड़ में हमें अपनी माटी, अपने परिवेश, प्रकृति और अन्नदाता को कभी नहीं भूलना चाहिए। यही हमारी असली ताकत और पहचान है।
