“विकसित भारत के निर्माण में शिक्षकों की भूमिका”: राजनांदगांव के ज्ञान मानसरोवर में ऐतिहासिक शिक्षक सम्मान समारोह भव्यता के साथ संपन्न

प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के तत्वावधान में आयोजित हुआ गरिमामयी प्रांतीय आयोजन; शिक्षा, अध्यात्म और राष्ट्र निर्माण का हुआ अनूठा संगम

राजनांदगांव 7 सितम्बर : आधुनिक भारत के निर्माण की नींव केवल ईंट और सीमेंट से नहीं, बल्कि विद्यालयों की चारदीवारी के भीतर गढ़े जा रहे चरित्रवान और संस्कारित युवाओं से मजबूत होती है। आज शिक्षा के साथ-साथ विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों, मानवीय संवेदनाओं और सदगुणों का समावेश होना समय की सबसे बड़ी और अनिवार्य मांग बन चुका है। केवल किताबी ज्ञान, डिग्रियां और अंकसूची हासिल कर लेने भर से एक विकसित और आत्मनिर्भर राष्ट्र की परिकल्पना को धरातल पर उतार पाना असंभव है। बच्चों को ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा, अनुशासन, संवेदनशीलता, उत्तरदायित्व और उच्च संस्कारों के ताने-बाने से जोड़ना ही आज के युग में हर एक शिक्षक का सबसे बड़ा और पवित्र दायित्व है।

यह अकाट्य और विचारोत्तेजक सत्य राजनांदगांव स्थित ‘ज्ञान मानसरोवर’ संस्थान में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के तत्वावधान में आयोजित शिक्षक सम्मान समारोह के दौरान मुख्य वक्ता के रूप में गूंजा। शिक्षक दिवस के पावन उपलक्ष्य में रविवार, 6 सितंबर को आयोजित इस भव्य एवं प्रेरणादायी कार्यक्रम का मुख्य केंद्रीय विषय “विकसित भारत के निर्माण में शिक्षकों की भूमिका” निर्धारित किया गया था, जिस पर उपस्थित समस्त शिक्षाविदों और प्रबुद्ध वक्ताओं ने बेहद गहराई से अपने विचार रखे।
दीप प्रज्वलन के साथ आध्यात्मिक ऊर्जा से हुआ शुभारंभ
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथियों, वरिष्ठ शिक्षाविदों और सेवाकेंद्र संचालिकाओं द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर विधिवत किया गया। दीप की अलौकिक रोशनी के साथ ही पूरा सभागार आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मकता से सराबोर हो गया।
समारोह की मुख्य वक्ता और राजनांदगांव सेवाकेंद्र संचालिका ब्रह्माकुमारी पुष्पा दीदी ने अपने मुख्य उद्बोधन में कहा कि आज देश जब 2047 तक ‘विकसित भारत’ के संकल्प को पूरा करने की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है, तब इस महाअभियान में शिक्षकों की भूमिका किसी रीढ़ की हड्डी से कम नहीं है। शिक्षक ही वह शिल्पकार है जो कच्ची मिट्टी जैसे कोमल बच्चों के जीवन को तराशकर उन्हें राष्ट्र का मजबूत स्तंभ बनाता है।
उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि राष्ट्र के भविष्य को संवारने से पहले शिक्षक को स्वयं अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, उच्च आदर्शों और श्रेष्ठ आचरण को अनिवार्य रूप से अपनाना होगा। छात्र-छात्राएं शिक्षक द्वारा मंच से दिए जाने वाले उपदेशों या भाषणों से उतने नहीं सीखते, जितने वे उनके दैनिक व्यवहार, आचरण और कार्यशैली से सीखते हैं। यदि शिक्षक स्वयं अपने आचरण से समाज के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत करेंगे, तो उसका सबसे गहरा, स्थाई और सकारात्मक प्रभाव विद्यार्थियों के कोमल मन और भविष्य पर पड़ेगा।
बौद्धिक सत्र के अंतिम चरण में ब्रह्माकुमारी पुष्पा दीदी ने सभी उपस्थित प्राचार्यों, शिक्षकों और गणमान्य अतिथियों को राजयोग मेडिटेशन का गहन अभ्यास कराते हुए अद्भुत आत्म-अनुभूति कराई, जिससे पूरा सभागार शांति और दिव्यता से भर गया।
अतिथियों और शिक्षाविदों के सारगर्भित संबोधन: राष्ट्र निर्माण में शिक्षक की धुरी भूमिका
समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए कवर्धा के जिला शिक्षा अधिकारी एफ.आर. वर्मा ने शिक्षकों के अतुलनीय योगदान और उनके त्याग को रेखांकित करते हुए कहा कि एक शिक्षक का प्रभाव कभी समाप्त नहीं होता, उसका निर्माण किया हुआ विद्यार्थी पीढ़ियों तक समाज को दिशा देता है।
विशिष्ट वक्ता के रूप में कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रो. डॉ. डाकेश्वर वर्मा ने कहा कि शिक्षक समाज का सच्चा मार्गदर्शक है जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। राजनांदगांव के पूर्व विकास खंड शिक्षा अधिकारी राजूलाल मोहबे ने अपने संस्मरण साझा करते हुए शिक्षा में मूल्यों की महत्ता पर प्रकाश डाला।
इसके साथ ही, राज्यपाल पुरस्कार से सम्मानित प्रतिष्ठित शिक्षक थंगेश्वर कुमार साहू, प्राचार्य वीरेन्द्र दुबे, श्रीमती सविता अवस्थी, हंसराज सोनपिपरे, श्रीमती आरती देवांगन, अनिता सहारे, कुसुम ठाकरे और शिक्षक आशिफ खान ने भी अपने प्रेरणादायी विचार साझा किए। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में इस बात पर जोर दिया कि नैतिक शिक्षा और भारतीय संस्कृति के संस्कारों को विद्यार्थियों के दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाना ही आज के समय की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।
उत्कृष्टता का सम्मान: ‘शिक्षादूत’ और ‘ज्ञानदीप’ पुरस्कारों से अलंकृत हुए समर्पित शिक्षक
यह समारोह केवल विचारों के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं था, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में आजीवन उत्कृष्ट कार्य करने वाले समर्पित शिक्षकों के सम्मान का एक महाकुंभ भी साबित हुआ। समारोह के दौरान कड़े मानदंडों और उनकी निष्ठा को देखते हुए विशेष रूप से सम्मानित किया गया:
- मुख्यमंत्री शिक्षा गौरव अलंकरण शिक्षादूत पुरस्कार से सम्मानित—श्रीमती स्वीटी वर्मा एवं माधव साहू
- ज्ञानदीप पुरस्कार से सम्मानित—रोहित साहू
इन सभी सम्मानित शिक्षकों को मंच पर अतिथियों द्वारा शॉल और श्रीफल भेंटकर अलंकृत किया गया। इसके अलावा समारोह में उपस्थित क्षेत्र के अन्य सभी प्राचार्यों और शिक्षकों को भी समाज और राष्ट्र निर्माण में अपनी अग्रिम व निर्णायक भूमिका निभाते रहने का पावन संदेश दिया गया।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, गुरु वंदन और भावपूर्ण वातावरण
कार्यक्रम का संचालन ब्रह्माकुमारी प्रभा बहन द्वारा बेहद शालीनता, प्रवाह और अनुशासन के साथ किया गया, जिसने पूरे आयोजन को बांधे रखा। इस बीच, ब्रह्माकुमार मोरध्वज भाई द्वारा प्रस्तुत किए गए सुमधुर और राष्ट्र-भक्ति व आध्यात्मिकता से ओतप्रोत गीत ने उपस्थित हर शख्स को भावविभोर कर दिया।
सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रृंखला में बाल कलाकारों ने अपनी कला से सबका मन मोह लिया:
- कुमारी इशिका एवं उनके साथियों ने अपनी मनमोहक प्रस्तुति के माध्यम से ‘गुरु वंदन’ किया, जिसे देखकर सभी की आंखें श्रद्धा से नम हो गईं।
- कुमारी रूही भोजवानी ने अपने आकर्षक स्वागत नृत्य से सभागार में पधारे सभी अतिथियों का पारंपरिक और भव्य अभिनंदन किया।
कार्यक्रम के अंत में सहायक जिला परियोजना समन्वयक (प.आर.) झाड़े ने समारोह की सफलता पर सभी का हार्दिक आभार व्यक्त किया।
गरिमामयी और विशाल उपस्थिति
छत्तीसगढ़ के इस ऐतिहासिक शिक्षा कुंभ में राजनांदगांव और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी, शिक्षाविद् और प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित रहे। प्रमुख रूप से उपस्थित गणमान्य महानुभावों में:
- प्रमुख शिक्षाविद् एवं प्रोफेसर: प्रो. शुभेंदु जेनामणि
- प्राचार्यगण: प्राचार्य मिलिन्द मुदलियार, सी.आर. वर्मा, हेमन्त साहू, श्रीकेश शर्मा
- विद्वान व शिक्षकगण: सुधीर जैन, मिलन साहू, योगेन्द्र सिंह ठाकुर, अनिल कुमार साहू, दिनकर श्रीवास्तव, दीपक शर्मा, विभोर साहू, जितेन्द्र हिरवानी
- महिला व्याख्याता एवं शिक्षिकाएं: श्रीमती शाहीन खान, मीनू माहेश्वरी, नीलू झाड़े, मीरा साहू, भारती साहू
सहित सैकड़ों की संख्या में विभिन्न विद्यालयों के प्राचार्य, व्याख्याता और शिक्षकगण उपस्थित रहकर इस ऐतिहासिक आयोजन के साक्षी बने। समारोह के अंत में सभी ने शिक्षा के जरिए एक सशक्त, नैतिक और ‘विकसित भारत’ के निर्माण का संकल्प लिया।
